विधायक स्वेच्छा अनुदान मद की राशि।
चहेते चाटूकारों को किया गया भुगतान राशि।
चेक से किया गया जारी पटेल जो है प्रभारी।
क्षेत्र का नहीं हुआ विकास तो क्या करे सरकार।
रिपब्लिक न्यूज।।
भोपाल // शहडोल। प्रदेश के सभी विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव की शुरुआत जोरों पर सभी नेताओं के वादे और इरादे संकल्प बचन के साथ जनसंपर्क का सियासत जारी।
विकास पर्व की गाथा चुनाव तैयारी की लगी तांता।
सियासत--कहीं पर नजरें कहीं पर निशाना
विकास पर्व की कहानी विधानसभा चुनाव की तैयारी।
लापता सांसद की तलाश जयसिंहनगर विधानसभा क्षेत्र पर की जा रही जारी।
कहा जाएगी मनीषा बेचारी।
भाजपा ने चंद महीने बाद मध्यप्रदेश में होने जा रहे चुनाव के लिए सभी विधानसभा चुनाव क्षेत्र के लिए जारी किया उम्मीदवारों की दूसरी सूची में जिन सांसदों और संगठन के राष्ट्रीय महासचिव के नाम घोषित किए हैं। उसमें परदे के पीछे छिपी कहानी का खुलासा होने लगा है। पार्टी नेतृत्व (मोदी - शाह) पर बारीक नजर रखने वाले सूत्रों के अनुसार सीधी सांसद रीति पाठक का बदलाव शरद को नचाओ की कहानी बनने जा रही है।
विशेष सूत्र अनुसार प्राप्त जानकारी दोनों नवीन प्रत्याशी विजय विधायक संभालेंगे अपने-अपने क्षेत्र के कमान। सांसद हिमाद्री सिंह जयसिंहनगर तो जय सिंह मरावी जैतपुर से होंगे विधायक प्रत्याशी?!
ऐसा ही मामला इंदौर से है राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, जबलपुर पश्चिम से सांसद राकेश सिंह तथा सतना से सांसद गणेश सिंह को विधानसभा चुनाव में टिकिट देने के पीछे 2018 में हुए चुनाव में इन्ही विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार की जीत के पीछे इन्हीं लोगों की साजिशी भूमिका रही है!
भाजपा के कद्दावर नेता जिन्होंने इंदौर संभाग के अलग - अलग विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था। 2018 में इन्होंने अपने पुत्र को भी विधायक बनवाकर संगठन में राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी संभाली थी। इंदौर 1 में कांग्रेस के उम्मीदवार, जिनसे कैलाश के पारिवारिक और आंतरिक संबंध हैं, जीत में परदे के पीछे से कैलाश की महती भूमिका रही है ! अब पार्टी ने कैलाश को ही मैदान में उतार दिया है। पूरी संभावना है कि कांग्रेस सिटिंग एमएलए को ही मैदान में उतारेगी तब कैलाश के सामने एक धर्म संकट तो खड़ा हो ही जायेगा कि वे अब किस मुंह से उस जनता से अपने लिए वोट मांगेंगे जिससे पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा कैंडीडेट के लिए वोट मांगने के बजाय कांग्रेस उम्मीदवार के लिए वोट मांगने गये थे। कैलाश अगर चुनाव जीत गये तो ठीक है मगर खुदा चुनाव हार गये तो उनका राजनीतिक कैरियर भी समाप्त हो सकता है।
इतना ही नहीं पार्टी ने कैलाश के बेटे आकाश को भी निशाने पर ले लिया है। परिवारवाद को कोसने वाले मोदी की पार्टी बाप - बेटे दोनों को टिकिट देते तो नहीं दिख रही। मतलब साफ दिख रहा है कि बाप की करनी का भुगतानी बेटे को भोगना पड़ेगा।
ऐसी ही कहानी जबलपुर पश्चिम से विजयी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार भनोट और राकेश सिंह के बीच बताई जा रही है। 2018 में भाजपा उम्मीदवार रहे व्यक्ति से राकेश का छत्तीस का आंकड़ा बताया जाता है। शायद यही कारण था कि राकेश ने अपनी ही पार्टी उम्मीदवार को हराने के लिए पर्दे के पीछे से कांग्रेस कैंडीडेट की भरपूर मदद की थी। नतीजा भी राकेश के अनुकूल ही रहा। अब भाजपा संगठन हाईकमान ने राकेश को ही भनोट (कांग्रेस से टिकिट मिलने की पूरी संभावना है) के सामने ही खड़ा कर दिया है।
इसी कतार में खड़े कर दिए गए हैं सतना सांसद गणेश सिंह। कहा जाता है कि गणेश सिंह ने अपने राजनीतिक वजूद की लकीर बड़ी बनाने के लिए भाजपा कैंडीडेट रहे। जीत के रास्ते में कांटे बोने में कोई कोर - कसर नहीं छोड़ी। नतीजा भी सबके सामने रहा। अब मोदी - शाह की जोड़ी ने गणेशाय नमः को ही सतना से टिकिट देकर अपने पार्टी विरोधी किये गये क्रिया - कलापों पर प्राश्चित करने का मौका दिया है।
चुनाव जीत गये तो ठीक वरना पार्टी दरकिनार करने में कोई संकोच नहीं करेगी।
जहां एक तबके के अनुसार मोदी - शाह द्वारा विधानसभा चुनाव में जिस तरह सांसदों को उम्मीदवारी दी जा रही है उससे इस बात के भी संकेत मिल रहे हैं कि अब पार्टी इन घिसे-पिटे चेहरों से उब चुके है और 2024 के आम चुनाव में नये लोगों को टिकिट देने की रणनीति बनाते दिख रही है। वैसे भी उच्च स्तरीय सूत्रों का कहना है कि मोदी - शाह के लिए 2023 से ज्यादा महत्वपूर्ण 2024 है। भले ही विधानसभा चुनाव हार जायें मगर हर हाल में लोकसभा चुनाव जीतना है चाहे उसके लिए किसी भी हद तक जाकर कुछ भी करना पड़े। वहीं दूसरे तबके का मानना है कि 2024 के चुनाव में जीत के लिए पूरी तरह से आश्वस्त मोदी - शाह सांसदों के बल बूते विधानसभा चुनाव जीत कर 2026 तक राज्यसभा में भाजपा सांसदों की संख्या में बढ़ने का मंसूबा बनाए हुए हैं।
2024 का चुनाव मोदी के लिए आखिरी चुनाव है। क्योंकि कि अपने बनाई गई गाइडलाइन के चक्रव्यूह में फंस कर रह गए और राजनीतिक जीवन यापन का हो जाएगा अंत।
कांग्रेस भी है सकते पर।
मध्यप्रदेश में सरकार बनाने के लिए पूरी तरह आश्वस्त कांग्रेस की परेशानी पर भी बल पड़ते दिखाई दे रहे हैं। 18 साल के राजा के खिलाफ जनता में परसी पड़ी नकारात्मकता के भरोसे आसानी से सरकार बना लेने का आत्मविश्वास पाले बैठी कांग्रेस की रणनीति मोदी - शाह द्वारा सांसदों की फौज को विधानसभा चुनाव में उतार देने से कोई गड़बड़ी हो गई है। कल तक जहां कांग्रेस अति आत्मविश्वास के रथ पर सवार होकर विचरण कर रही थी, सांसदों के विधानसभा चुनाव में उतरने से कांग्रेस को अपनी रणनीतिक साझेदारी को बदलने के लिए विवश होना पड़ गया है। भाजपा से पहले अपने उम्मीदवारों का ऐलान करने वाला कांग्रेसी आलाकमान भाजपा के तकरीबन एक चौथाई कैंडीडेट घोषित हो जाने के बावजूद अपने एक उम्मीदवार का नाम अभी तक घोषित नहीं कर पाया है।
कांग्रेस द्वारा भाजपा की जन आशीर्वाद यात्रा का काउंटर करने निकाली जा रही जन आक्रोश यात्रा के लिए प्रभारी बनाये गये जिम्मेदार कुछ जगहों पर भाजपा से साठ गांठ करते नजर आ रहे हैं। ऐसा ही वाक्या कटनी जिले में दिखाई दिया जो कांग्रेसियों सहित जनता के बीच भी चर्चा में बना हुआ है। बताया जाता है कि कटनी जिले में कांग्रेस की जन आक्रोश यात्रा का नेतृत्व करने का उत्तरदायित्व अजय सिंह को सौंपा गया था। उनका कटनी की धरा पर आगमन तो हुआ मगर वे कटनी में एक कांग्रेस के पूर्व विधायक के घर में कटनी के सिटिंग एमएलए से तकरीबन एक घंटा गोपनीय मुलाकात कर यात्रा को मझधार में छोड़कर वापस लौट गये। स्थानीय कांग्रेसियों के माले और गुलदस्ते ताकते रह गये।
भाजपाई विधायक से कांग्रेस के कद्दावर नेता की गुफ्तगू को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कहीं एक बार फिर से कांग्रेस नेताओं के द्वारा कटनी जिले में पिछले 20 सालों से कांग्रेस की डूबी हुई लुटिया को अगले 5 साल के लिए फिर से डुबाये रखने के ताने-बाने तो नहीं बुने जा रहे हैं ! शायद यही कारण है कि जिस जन आक्रोश यात्रा को कटनी होते हुए सिहोरा की ओर जाना था उसे शहर के बीच मे ही खत्म करना पड़ा।
