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ज़िले के क्षेत्र में फैला अवैध कारोबार संबंधित विभाग बनकर बैठा अंजान।

 काला कारोबार कागजों में कहीं नहीं, कथित तौर पर खुलेआम बिक रहा गांजा संबंधित विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल, थाना प्रभारी की कार्यवाही है अंजान?


विद्यालय के आसपास नशे का कथित अड्डा, कैमरे में कैद होने के दावे; एक नहीं कई ठिकानों की जानकारी होने का दावा अब जांच की बारी पुलिस अधिकारियों की।


अवैध मादक पदार्थों की बिक्री को रोकने में संबंधित अधिकारी कर्मचारी नाकाम या मौन सहमति तो ऐसे में जिम्मेदार कौन।


रिपब्लिक न्यूज़।।


शहडोल मुख्यालय जिला के थाना क्षेत्रों का इन दिनों कथित अवैध गांजा बिक्री के आरोपों को लेकर सवालों के घेरे में है। शिकायतों में दावा किया जा रहा है कि कागज-कलम पर भले ही कहीं कोई कारोबार दर्ज न हो, लेकिन जमीन पर कथित रूप से गांजे की बिक्री का सिलसिला चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह आरोप सही हैं तो आखिर यह कारोबार पुलिस की निगाह से कैसे बचा हुआ है? मामले में थाना स्तर पर सक्रिय बताए जाने वाले कथित ‘कारखास’ की भूमिका पर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कारखास की कथित मिलीभगत से अवैध कारोबारियों से वसूली की जा रही है और थाना प्रभारी को वास्तविक स्थिति से गुमराह किया जा रहा है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन यदि आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो मामला केवल गांजा बिक्री का नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र के भीतर संभावित संरक्षण और जवाबदेही का भी बन जाता है। सबसे गंभीर सवाल विद्यालय को लेकर है।

बताया जा रहा है कि कथित बिक्री स्थल से कुछ ही दूरी पर विद्यालय स्थित है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि नशीले पदार्थ की बिक्री विद्यालय के आसपास हो रही है तो बच्चों के सुरक्षित भविष्य की जिम्मेदारी किसकी होगी? कानून- व्यवस्था की निगरानी करने वाली पुलिस और संबंधित प्रशासनिक तंत्र क्या इस संभावित खतरे से अनजान है या शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा? मामले को और गंभीर बनाने वाला दावा यह है कि कथित रूप से गांजे की बिक्री किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। वीडियो और तस्वीरों के माध्यम से अलग-अलग ठिकानों की जानकारी होने की बात सामने आ रही है। कथित रूप से किन स्थानों पर बिक्री होती है, कौन लोग इसमें शामिल हैं और इसकी आपूर्ति कहां से होती है—इन सभी बिंदुओं की जांच यदि निष्पक्ष तरीके से की जाए तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। गांजे की अलग-अलग किस्मों में टीएचसी की मात्रा अलग- अलग हो सकती है, और अधिक टीएचसी वाला गांजा अधिक मनो-सक्रिय प्रभाव डाल सकता है। 

इसलिए किसी एक किस्म को सनसनीखेज ढंग से सबसे नशीला बताने के बजाय पुलिस को बरामद पदार्थ की वैज्ञानिक जांच करानी चाहिए और उसी के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए। 

अब थाना की पुलिस के पाले में है। क्या जिला के नगर और क्षेत्रों के आसपास के कथित ठिकानों की गोपनीय जांच होगी? क्या कई शासकीय विद्यालय के आसपास विशेष निगरानी बढ़ाई जाएगी? क्या कथित माफियाओं की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होगी? और यदि आरोप गलत हैं तो पुलिस इसका खंडन सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं करती?

मामले में पुलिस आयुक्त मध्यप्रदेश के संबंधित पुलिस उपायुक्त, सहायक पुलिस आयुक्त तथा थाना प्रभारी से अपेक्षा है कि प्राप्त जानकारी की सत्यता की जांच कराई जाए। यदि गांजे की अवैध बिक्री की पुष्टि होती है तो केवल कथित विक्रेता तक कार्रवाई सीमित न रखकर आपूर्ति की पूरी कड़ी, आर्थिक लेन-देन और संभावित संरक्षण देने वालों तक जांच पहुंचाई जाए। 

वहीं साथ ही, यदि किसी पुलिसकर्मी या कथित विभाग की भूमिका सामने आती है तो उसके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई हो। क्योंकि असली सवाल यह नहीं कि गांजा कहां बिक रहा है। सवाल यह है कि अगर यह कारोबार सचमुच चल रहा है, तो इतने समय से किसकी नजर के सामने चल रहा है और किसकी जिम्मेदारी तय होगी? आने वाले समय में यदि आरोपों की पुष्टि होती है तो यह मामला केवल एक ठिकाने की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे कथित नेटवर्क की पड़ताल का विषय बन सकता है। अब देखना यह है कि पुलिस जांच की दिशा कथित विक्रेता तक जाती है या कथित संरक्षण देने वालों तक भी पहुंचती है।

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