प्रेस' पर सख्ती स्वागत योग्य, पर क्या पुलिस और सत्ता के रसूख पर भी लागू होगा संविधान का अनुच्छेद 14?।
रिपब्लिक न्यूज़।।
शहडोल पुलिस द्वारा 1 अगस्त से 10 अगस्त तक निजी वाहनों पर 'प्रेस', 'पुलिस', 'न्यायालय', 'भारत सरकार' और 'मध्यप्रदेश शासन' जैसे शब्दों के अनधिकृत उपयोग के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान का उद्देश्य यदि फर्जीवाड़े को रोकना और कानून-व्यवस्था बनाना है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
लेकिन इस पूरी कार्रवाई के केंद्र में एक ही सबसे बड़ा और बुनियादी सिद्धांत होना चाहिए नियम और निर्देश सबके लिए एक समान होने चाहिए।
यदि कानून का डंडा केवल आम नागरिकों और पत्रकारों की गाड़ियों पर चलेगा, और खाकी व खादी से जुड़े रसूखदार इससे अछूते रहेंगे, तो यह अभियान 'कानून का राज' नहीं बल्कि 'प्रशासनिक हठधर्मिता' कहलाएगा।
जब कानून एक है, तो कार्रवाई में दोहरा मापदंड क्यों? मोटर यान अधिनियम (Motor Vehicles Act) में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि पुलिस अधिकारी का निजी वाहन या किसी नेता की व्यक्तिगत गाड़ी कानून से ऊपर है।
पुलिसकर्मियों के अपने निजी वाहन
शहडोल जिले के थानों, पुलिस लाइन और चौकियों के बाहर खड़े दर्जनों पुलिसकर्मियों के निजी दोपहिया और चार पहिया वाहनों पर 'POLICE', पद का नाम या विभाग का मोनोग्राम साफ देखा जा सकता है। जब कानूनन निजी वाहन पर विभाग का नाम लिखना पूरी तरह अवैध है, तो अभियान की शुरुआत खुद पुलिस महकमे से क्यों नहीं होनी चाहिए?
नेताओं और जनप्रतिनिधियों की गाड़ियां।
सड़कों पर खुलेआम दौड़ रही सत्ताधारी दल और विपक्ष के नेताओं, कार्यकर्ताओं और तथाकथित 'प्रतिनिधियों' की गाड़ियों पर 'मध्यप्रदेश शासन', 'जिलाध्यक्ष', 'विधायक प्रतिनिधि' के अवैध बोर्ड, हुटर, फ्लैश लाइटें और काली फिल्में लगी होती हैं।
क्या प्रदेश के शहडोल पुलिस-प्रशासन में इतना नैतिक साहस है कि वह किसी रसूखदार नेता की गाड़ी रोककर उसका चालान काटे या बोर्ड उतरवाए?
पत्रकारिता और आम नागरिक।
फर्जी 'प्रेस' लिखकर घूमने वालों या अवैध गतिविधियां चलाने वालों पर कार्रवाई बिल्कुल सही है, क्योंकि इससे असली और ईमानदार पत्रकारों की साख भी खराब होती है। लेकिन चेकिंग के नाम पर असली पत्रकारों को परेशान करना या उन पर द्वेष निकालना पूरी तरह अनुचित है।
असली 'कानून का राज' किसे कहते हैं?
एक स्वस्थ और निष्पक्ष समाज का निर्माण तब तक नहीं हो सकता जब तक नियम लागू करने वाली संस्थाएं खुद को नियम से ऊपर समझेंगी।
न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। अगर चालान कटेगा तो पत्रकार, पुलिसकर्मी, नेता और आम नागरिक—सबका एक ही तराजू में तौलकर कटना चाहिए।
पारदर्शिता की मांग: शहडोल पुलिस को इस 10 दिवसीय अभियान के दौरान रोजाना यह आंकड़ा भी सार्वजनिक करना चाहिए कि उन्होंने कुल कितने 'प्रेस', कितने 'पुलिस' और कितने 'शासन/नेता' लिखे निजी वाहनों पर कार्रवाई की है।
मिसाल पेश करे खाकी: दूसरों को कानून का पाठ पढ़ाने से पहले यदि पुलिस प्रशासन अपने ही महकमे के कर्मचारियों के निजी वाहनों से अवैध 'POLICE' लिखे स्टिकर हटवाता है, तो जनता में पुलिस के प्रति विश्वास और सम्मान कई गुना बढ़ जाएगा।
नियम और निर्देश किसी वर्ग विशेष के लिए नहीं, बल्कि 'सबके लिए' होते हैं। शहडोल पुलिस का यह अभियान तभी सफल और जनहितकारी माना जाएगा जब 1 से 10 अगस्त के बीच सड़कों पर निष्पक्षता का संदेश दिखेगा।
यदि खाकी का डंडा कलमकार के साथ-साथ खादी और खुद खाकी पर भी समान रूप से चला तो वहीं शहडोल पुलिस-प्रशासन का यह कदम पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बन जाएगा!