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दो वर्षों से जर्जर हालत में पुलिया विभाग की लापरवाहीं आधार में लटका निर्माण जान जोखिम में डालकर गुजरते हुए लोग।

रोपाई के मौसम में विकास का बुलडोजर! पुलिया टूटी, नहर थमी, किसानों की सांसें अटकीं।

सैकड़ों गांवों की जिंदगी पटरी से उतर जाने का संकट।

क्या किसी ने सोची ग्रामीणों की पीड़ा? स्कूल जाने वाले बच्चे, अस्पताल पहुंचने वाले मरीज, खेतों में खड़े किसान और श्रद्धालु सब होंगे परेशान।

रिपब्लिक न्यूज।।

शहडोल मुख्यालय जिला के तहसील जनपद सोहागपुर क्षेत अंतर्गत सिंहपुर थाना ग्राम बोडरी खैरहा पहुंच मार्ग पर जर्जर हालत में चल रहा पुलिया जिसको लगभग दो वर्षों से निर्माण कार्य विभाग द्वारा किया जाना चाहिए था लेकिन अब केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की कठिन सच्चाइयों को उजागर करने वाला मामला बन गया है। 

जिस पुलिया को वर्षों से क्षेत्र के लोगों की जीवनरेखा चलती है, ऐसे में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के तोड़ दिए जाने या टुटने से सैकड़ों गांवों का संपर्क प्रभावित हो जाएगा। ग्रामीणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है क्या विकास कार्यों की योजना बनाते समय कभी गांव के लोगों उन किसान और आम जनता की जरूरतों के बारे में भी सोचा गया था? धान की रोपाई का मौसम चल रहा है। खेतों में बेहन तैयार है,किसान आसमान की ओर भी देख रहा है और नहर के पानी की राह भी। लेकिन ऐसे समय में निर्माण कार्य के कारण नहर संचालन प्रभावित होने और आवागमन बाधित होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है। कई किसानों का कहना है कि खेती में समय ही सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि रोपाई का सही समय निकल गया तो नुकसान की भरपाई पूरे साल नहीं हो सकेगी।

किसान की चिंता: "फसल बचेगी या नहीं?

सुबह सूरज निकलने से पहले खेत पहुंचने वाला किसान आज रास्तों और पानी की चिंता में घिरा है। जिन खेतों में इन दिनों रोपाई की चहल-पहल होनी चाहिए थी, वहां किसानों के बीच चिंता और अनिश्चितता का माहौल दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि विकास कार्य का विरोध नहीं है, लेकिन ऐसा समय चुना गया जब खेती का सबसे संवेदनशील दौर चल रहा है।

स्कूल जाने वाले बच्चों की बढ़ी मुश्किल।

हर सुबह बस्ते लेकर निकलने वाले बच्चे अब लंबा चक्कर लगाने को मजबूर हैं।

कई अभिभावकों का कहना है कि छोटे बच्चों को वैकल्पिक रास्तों से भेजना जोखिम भरा है। बारिश के दिनों में यह परेशानी और बढ़ सकती है। शिक्षा के अधिकार की बात करने वाली व्यवस्था क्या इन बच्चों की रोजमर्रा की परेशानियों को देख रही है?

मरीज और बुजुर्ग सबसे ज्यादा चिंतित।

ग्रामीण क्षेत्र में अस्पताल पहले ही दूर हैं। ऐसे में यदि किसी बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ जाए, किसी गर्भवती महिला को तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ जाए या किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अस्पताल ले जाना हो, तो हर मिनट कीमती होता है। ग्रामीणों का कहना है कि रास्ता बाधित होने से आपातकालीन परिस्थितियों में खतरा बढ़ गया है।

श्रद्धालुओं और राहगीरों की भी बढ़ी परेशानी।

यह मार्ग केवल गांवों को जोड़ने वाला रास्ता नहीं, बल्कि आसपास के धार्मिक स्थलों और बाजारों तक पहुंचने का भी प्रमुख माध्यम है। श्रद्धालुओं, व्यापारियों और दैनिक यात्रियों को अब अतिरिक्त दूरी और समय खर्च करना पड़ रहा है। कई लोगों का कहना है कि यदि पहले से सूचना दी जाती और वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाती, तो इतनी परेशानी नहीं होती।

पशुपालकों की अलग चिंता।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन महत्वपूर्ण हिस्सा है। पशुओं के लिए चारा, भूसा और अन्य आवश्यक सामग्री लाने-ले जाने में भी लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई पशुपालकों का कहना है कि परिवहन में बढ़ी कठिनाई का सीधा असर उनकी दिनचर्या पर पड़ रहा है।

सबसे बड़ा सवाल क्या जनता को पहले बताया गया था?

ग्रामीणों के बीच लगातार यह चर्चा है कि क्या पुलिया तोड़ने से पहले व्यापक स्तर पर सूचना दी गई थी? क्या गांवों में मुनादी कराई गई? क्या सूचना पट्ट लगाए गए? क्या लोगों को बताया गया कि कितने दिन तक रास्ता प्रभावित रहेगा? क्या मीडिया और जनप्रतिनिधियों को इसकी जानकारी देकर जनता को तैयार किया गया? यदि ऐसा हुआ था तो जानकारी आम लोगों तक क्यों नहीं पहुंची, और यदि नहीं हुआ था तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न बनता है।

विकास जरूरी, लेकिन जनता को संकट में डालकर नहीं।

ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें पुलिया निर्माण या विकास कार्य से कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति केवल इस बात से है कि बिना पर्याप्त तैयारी और वैकल्पिक व्यवस्था के ऐसा कदम क्यों उठाया गया, जिससे आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़े।

जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग

ग्रामीणों ने जिलाधिकारी से तत्काल हस्तक्षेप कर स्थिति का निरीक्षण कराने, अस्थायी डायवर्जन मार्ग बनवाने और निर्माण कार्य से प्रभावित लोगों की समस्याओं का समाधान कराने की मांग की है। उनका कहना है कि विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब वह जनता को सुविधा दे, न कि उन्हें असुविधा और चिंता में डाल दे। 

पुलिया का मामला अब सिर्फ निर्माण कार्य का विषय नहीं रह गया है। यह उस सवाल का प्रतीक बनता जा रहा है कि योजनाएं कागज पर बनती हैं या जमीन की वास्तविक जरूरतों को समझकर।

अब गांव आज जवाब मांग रहा है विकास किसके लिए और किस कीमत पर

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