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फर्जी जाति प्रमाण बनाम जनजातीय विभाग उपायुक्त आदिवासी अधिकारी ।

 प्रदेश में बढ़ता जा रहा है फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाने और उसे जारी करने का सिलसिला ।

 नहीं रहा किसी का भए।

 जब एक न्यायालय में प्रकरण का फैसला सही हुआ जांच के उपरांत तो फिर एफ आई आर दर्ज क्यों नहीं हुआ।


  रिपब्लिक न्यूज।

शहडोल // मुख्यालय अंतर्गत शासकीय विभागों में पदस्थ कार्यरत फर्जी अधिकारियों और कर्मचारियों की जानकारी हमेशा सुर्खियो  में बना रहता है एक ऐसा ही मामला शहडोल मुख्यालय में पदस्थ उपायुक्त डिप्टी कमिश्नर ऑफ ट्राइबल विभाग में पदस्थ एक महिला अधिकारी जिनकी नियुक्ति तो ठीक है लेकिन जाति फर्जी है मिलते जुलते सरनेम लिखें नाम का उठाया फायदा।

 न्यायालय में चल रहे प्रकरण में जांच उपरांत न्यायालय का फैसला भी आया जो कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर शासकीय कर्मचारी पद पर पदस्थ हुए और प्रमोशन पदोन्नति लिया गया । 

जिस पर न्यायालय में प्रकरण क्रमांक सी-6-2/80/3/1 भोपाल दिनांक 06.10.80 एवं क्रमांक सी-2-98-03-1 भोपाल दिनांक 26.05.1998 में दिए गए।

 निर्देशानुसार इस प्रकार की कार्यवाही करने के लिए इस बात का कोई प्रतिबन्ध नहीं है कि उस शासकीय सेवक ने अपनी दोष सिद्धि के विरूद्ध अपील दायर कर दी है। 

इस लिए शस्ति अधिरोपित नहीं की जा सकता और इसके  उपरान्त भी लगातार राजनैतिक संरक्षण प्राप्त कर लगातार शासकीय सेवा कर रही हैं। 

नियमानुसार अगर किसी भी व्यक्ति / शासकीय सेवक को न्यायालय द्वारा दोषी पाए जाने पर  उसे दण्डित किया गया तो उसके विरुद्ध विभाग को यह अधिकारिता होती है कि तत्काल उसे सेवा से पृथक किया जावे। किन्तु श्रीमती उषा अजय सिंह के विरूद्ध जनजातीय कार्य विभाग द्वारा किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं की गई है। श्रीमती उषा अजय सिंह के विरूद्ध पारित निर्णय दिनांक 29.12.2017 के परिपालन में उन्हें उनके पद से सेवा समाप्त किया जाना न्याय हितार्थ में आवश्यक है।

संबंधित फर्जी जाति प्रमाण पत्र अधिकारी ने अपने पहुंच और अंत में उन्होंने शिवराज सिंह से विनती की है 

 न्यायालय श्रीमान अतिरिक्त सत्र न्यायालय के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भोपाल के सत्र प्रकरण क्रमांक 544 / 2013 जे० एल० मिश्रा बनाम श्रीमती उषा अजय सिंह में पारित निर्णय दिनांक 24.12.2017 के पालन में श्रीमती उषा अजय सिंह संभागीय उपायुक्त जनजातीय कार्य एवं अनुसूचित जाति विकास संभाग शहडोल एवं संभाग जबलपुर के विरूद्ध वैधानिक कार्यवाही की जाकर तत्काल उनके पद से पदच्युत (बर्खास्त) किया जाए।

 लेकिन यह जानना भी बहुत जरूरी है कि जिस न्यायाधीश के न्याय का हवाला देकर विभिन्न आरोपों को झेल रहे केके सिंह ने अपनी बात कही है न्यायाधीश ने क्या कहा था।

न्यायालय प्रथम अतिरिक्त सत्र न्यायालय के द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश भोपाल-वाचस्पति मिश्र ने( वर्तमान में शहडोल उपायुक्त जनजातीय कार्य विभाग  उषा अजय सिंह के मामले को लेकर) प्रकरण जे.एल. मिश्रा ।

प्रधान संपादक योग गर्जना, भोपाल बनाम
श्रीमती उषा अजय सिंह पति अजय सिंह आयु 52 वर्ष निवासी -34  कर्नल एयरपोर्ट रोड भोपाल मे निर्णय दिनांक 29 दिसम्बर 2017 को पारित आदेश में कहा था ।
यह भी उल्लेखनीय है कि आरोपिया द्वारा पूर्व में प्रस्तुत अपराध के संदर्भ में संज्ञान लिए जाने की स्टे पर दं.प्र.सं. की धारा 482 के अंतर्गत संस्थित याचिका नं.(एमसीआरसी नं. 13305/11 दिनांक 22.04.13) भी निरस्त की गई है। जहां तक रिटपेटीशन नं. 12297/09 के अंतर्गत दिनांक 25.11.09 को पारित अंतरिम स्टे का प्रश्न है 
उक्त याचिका के अंतर्गत केवल आरोपिया की सेवा के संबंध में अंतरिम स्टे जारी
किया गया था अथवा क्रिमिनल प्रासिक्यूसन के विरुद्ध कोई स्टे जारी किया जाना नहीं पाया जाता है। बचाव पक्ष द्वारा उपर्युक्त का खण्डन नहीं किया गया है।

 उक्त विवेचन एवं विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष यह है कि आरोपिया के विरुद्ध भादवि की धाराओं 463, 420 एवं 471 के अंतर्गत अभियोजन अपना
मामला संदेह के परे स्थापित करने में सफल रहता है।

जहां तक मा.द.वि. की धारा 467 का प्रश्न है अभिलेख पर यह नहीं आया है। कि आरोपियों (उषा अजय सिंह )ने उक्त दस्तावजी की स्वयं कोई क्रूटरचना की हो। अतः आरोपिया को भा.दं.वि. की धारा 467 के अपराध से दोषमुक्त किया जाता है।

परिणामतः  यह न्यायालय आरोपिया श्रीमती उषा अजय सिंह पत्नि  अजयसिंह को भा.दं.वि. की धारा 466, 467, 468, 471, 420 के स्थान पर मात्र धारा 468,20 एवं 471 भा.द.वि. के अंतर्गत दोषी पाती है।

 सजा के प्रश्न पर उभय पक्ष को सुना गया बचाव पक्ष से यह तर्क किया है कि आरोपिया का यह प्रथम अपराध है। अतः आरोपिया को न्यूनतम कारावास की सजा अधिरोपित किए जाने का निवेदन किया है।  
इसके विपरीत विद्वान अपर लोक अभियोजक ने अधिकतम दण्ड अधिरोपित किए जाने की मांग की गई है। सजा के प्रश्न पर विचार किया गया। अपराध की प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में आरोपिया को भा.द.वि की धारा 468 के अंतर्गत /02 वर्ष के सश्रम कारावास एवं 2000/-रू के अर्थदंड एवं भा.द.वि की धारा 420 के अंतर्गत 01 वर्ष का सश्रम कारावास एवं 1000/- के अर्थदंड एवं भा.द.वि की धारा 471 के अंतर्गत 01 वर्ष का सश्रम कारावास एवं 1000/- के अर्थदंड से दंडित किये जाने से न्याय के उददेश्य की पूर्ति हो जाती है।
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 उक्तानुसार दोषी सहायक आयुक्त आदिवासी विभाग शहडोल श्रीमती उषा अजय सिंह पत्नि  अजय सिंह को भादवि की धारा 468 के अंतर्गत 02 वर्ष के सश्रम कारावास एवं 2000/ रु.के पद एवं भादवि की धारा 420 के अंतर्गत 01 पर्दाग कारावास ए 1000/- के अर्थदंड एवं भा.द.वि की धारा 471 के अंतर्गत 01 वर्ष का सश्रम का  एवं 1000/- से दंडादिष्ट किया जाता है। अर्थदण्ड अदा किये जाने में यतिक्रम की दशा में प्रत्येक अपराध के समझ दोषी को छ-छ: माह का अतिरिक्त
समक-पृथक भुगताया जाये।
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