रिपब्लिक न्यूज।।
शहडोल मुख्यालय जिला प्रशासन के संबंधित विभाग का सुशासन और लोक कल्याण का दम भरने वाले प्रशासनिक तंत्र की नाक के नीचे शहडोल जिला मुख्यालय पर संवेदनहीनता का एक ऐसा कारनामें का इतिहास लिखा जा रहा है, जिसने सिटिजन्स चार्टर और मानवीय अधिकारों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। नगर पालिका परिषद और जिला स्वास्थ्य विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे लगभग 300 दैनिक वेतन आउटसोर्स कर्मचारी पिछले चार से सात महीनों से बिना यह महज एक प्रशासनिक कछुआ चाल नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर 300 परिवारों के जीने के अधिकार पर कुठाराघात है, जिसने अब एक बड़े जन-आक्रोश का रूप ले लिया है। वेतन के काम करने को मजबूर हैं।
ऐसा विडंबना देखिए कि जिन कर्मचारियों के कंधों पर शहर की सफाई, सुव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का दमदार है। आज वही कर्मचारी अपने बच्चों की स्कूल फीस, बूढ़े मां-बाप की दवाइयां और दो वक्त की रोटी के लिए पाई-पाई को तरस रहे हैं। प्रशासनिक गलियारों में फाइलें धूल खा रहे हैं, और जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर जांच के नाम पर खोखला रोना रो रहे हैं।
यह महज एक प्रशासनिक कछुआ चाल नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर 300 परिवारों के जीने के इस पूरे मामले में सबसे सनसनीखेज और गंभीर मोड़ नगर पालिका परिषद के भीतर सामने आया है। वर्तमान मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) निशांत सिंह ठाकुर का कहना है कि तत्कालीन सीएमओ द्वारा किसी कथित जांच के सिलसिले में वेतन रोका गया था। लेकिन भीतरखाने की खबर और पीड़ित कर्मचारियों के आरोपों ने इस 'जांच' की कलई खोलकर रख दी है। आरोप है कि इस कथित जांच और प्रशासनिक उठापटक की आड़ में कई पुराने, अनुभवी और निष्ठावान कर्मचारियों को जबरन 'घर बैठा' दिया गया और उनकी जगह बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के, गुपचुप तरीके से नए लोगों को मलाईदार पदों पर रख लिया गया। यह सीधे तौर पर एक सुनियोजित 'भर्ती खेल' की ओर इशारा करता है, जिसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होनी अनिवार्य है। सवाल यह उठता है कि यदि जांच किसी प्रक्रिया या अधिकारी की विफलता पर थी, तो उसकी सजा इन गरीब आउटसोर्स कर्मचारियों को क्यों दी जा रही है जिनके घरों में पिछले चार महीनों से केवल आर्थिक तंगी और मायूसी का सन्नाटा पसरा है?
अधिकार पर कुठाराघात है, जिसने अब एक बड़े जन-आक्रोश का रूप ले लिया है।
जांच की आड़ में 'चहेतों' को रेवड़ियां,नपा में नियुक्तियों का बड़ा खेल!
इस पूरे मामले में सबसे सनसनीखेज और गंभीर मोड़ नगर पालिका परिषद के भीतर सामने आया है। वर्तमान मुख्य नगरपालिका अधिकारी (सीएमओ) निशांत सिंह ठाकुर का कहना है कि तत्कालीन सीएमओ द्वारा किसी कथित जांच के सिलसिले में वेतन रोका गया था। लेकिन भीतरखाने की खबर और पीड़ित कर्मचारियों के आरोपों ने इस 'जांच' की कलई खोलकर रख दी है। आरोप है कि इस कथित जांच और प्रशासनिक उठापटक की आड़ में कई पुराने, अनुभवी और निष्ठावान कर्मचारियों को जबरन 'घर बैठा' दिया गया और उनकी जगह बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के, गुपचुप तरीके से नए लोगों को मलाईदार पदों पर रख लिया गया। यह सीधे तौर पर एक सुनियोजित 'भर्ती खेल' की ओर इशारा करता है, जिसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच होनी अनिवार्य है। सवाल यह उठता है कि यदि जांच किसी प्रक्रिया या अधिकारी की विफलता पर थी, तो उसकी सजा इन गरीब आउटसोर्स कर्मचारियों को क्यों दी जा रही है जिनके घरों में पिछले चार महीनों से केवल आर्थिक तंगी और मायूसी का सन्नाटा पसरा है?
स्वास्थ्य विभाग का दावा बनाम हकीकत 07 माह का दर्द और 2 दिन का लॉलीपॉप।
वही दूसरी ओर जिला स्वास्थ्य विभाग की स्थिति तो और भी बदतर और शर्मनाक है। यहां कार्यरत करीब 250 आउटसोर्स स्वास्थ्य कर्मी पिछले सात महीनों से बिना फूटी कौड़ी मिले अपनी जान जोखिम में डालकर सेवाएं दे रहे हैं। जब पानी सिर से ऊपर चला गया और मीडिया ने तीखे सवाल दागना शुरू किए, तब जाकर विभागीय हुक्मरानों की नींद टूटी। अब अधिकारियों द्वारा 'दो दिन के भीतर शत-प्रतिशत भुगतान' का एक नया लॉलीपॉप थमा दिया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह आश्वासन सिर्फ आक्रोश को दबाने की एक नाकाम कोशिश है।
20 वर्षों से क्षेत्र की नब्ज टटोलने वाले पत्रकारों और प्रबुद्ध जनों का भी यही मानना है कि बजट की अनुपलब्धता या तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर महीनों तक वेतन रोकना सीधे तौर पर वित्तीय कुप्रबंधन और अकर्मण्यता का प्रमाण है। अगर दो दिनों के भीतर इन शोषित कर्मचारियों के खातों में उनकी गाढ़ी कमाई की राशि नहीं पहुंचती है, तो यह कड़ा प्रशासनिक गतिरोध न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को ठप कर देगा बल्कि सरकार की साख को भी पूरी तरह मटियामेट कर देगा।
अब देखना यह है कि शहडोल का शीर्ष प्रशासन इस मानवीय संकट पर क्या त्वरित और ठोस दंडात्मक कार्रवाई करता है।