गोहपारू में 'कागजी गश्त' की बलि चढ़ा तेंदुआ।
शासन से करोड़ों की बजट, धरातल पर मौत कारोबार।
रिपब्लिक न्यूज।।
शहडोल मुख्यालय जिला के दक्षिण वन मंडल के गोहपारू वन परिक्षेत्र में वन्यजीवों की सुरक्षा बेनकाब हो रहा है।
स्थानीय विशेष सूत्रों अनुसार प्राप्त जानकारी जिले के वन क्षेत्र स्थित पटोरी सर्किल के बीट सकरिया में एक खुले कुएं में तेंदुए का शव मिलना महज एक हादसा नहीं, बल्कि वन विभाग के भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का साक्ष्य है।
शासन की ओर से वन्य प्राणियों की सुरक्षा और इंतजामों के लिए करोड़ो रूपए के आदेश जारी होते हैं, लेकिन गोहपारू में यह पैसा वन्यजीवों की जान बचाने के बजाय संबंधित अधिकारियों और उनके विभागों के खाना पुर्ति भरने में खर्च हो रहा है।
रेंजर और संबंधित बीट प्रभारियों की कागजों में गश्त।
वन परिक्षेत्र अधिकारी के खास कहे जाने वाले मैदानी कर्मचारी केवल साहब को 'प्रसन्न' करने की जुगत में लगे रहते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि क्षेत्र में गश्त केवल कागजों पर हो रही है। अगर बीट गार्ड और सुरक्षा कर्मी ईमानदारी से जंगल में होते तो कई दिनों का एक विशालकाय तेंदुआ कुएं में दम नहीं तोड़ता।
संबंधित विभाग के बीट प्रभारी की झूठी गश्त का हवाला देकर उच्च अधिकारियों को गुमराह किया जा रहा है और कागजी कार्यवाही कर हर बड़े मामले को रफा-दफा कर दिया जा रहा है।
शासन से स्वीकृति वन सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपए का आवंटित बजट कहा गया।
प्रदेश सरकार वन्य प्राणियों को दुर्घटनाओं से बचाने के लिए खुले कुओं के चारों ओर मुंडेर (बाउंड्री वाल) बनवाने के लिए भारी-भरकम बजट आवंटित करती है। सवाल यह है कि गोहपारू वन परिक्षेत्र में यह मुंडेर आखिर बनी कहाँ हैं?
बंदरबांट का खेल: क्या मुंडेर निर्माण की राशि भी पौधारोपण और अन्य निर्माण कार्यों की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई?
जिम्मेदार कौन क्षेत्र के बीट प्रभारी या क्षेत्र प्रभारी यह बताएंगे कि उनके क्षेत्र में अब तक कितने खुले कुओं को सुरक्षित किया गया है?
सुरक्षा का मूल उद्देश्य भूला अमला, राशि हड़पने में मस्त
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए तैनात अमले का मूल उद्देश्य अब केवल शासकीय राशि का बंदरबांट करना रह गया है।
भोपाल से मिलने वाली सुरक्षा निधि का उपयोग वन्यजीवों के संरक्षण के बजाय निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
5 दिन पुरानी तेंदुए की लाश यह चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि गोहपारू में 'रक्षक ही भक्षक' बन चुके हैं।
जब ग्रामीणों ने बदबू आने के बाद कुएं में देखा, तब विभाग की नींद टूटी। डिप्टी रेंजर का फोन न उठाना और RO का चुप्पी साध लेना यह साबित करता है कि वे अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए केवल 'फाइलें' तैयार कर रहे हैं। क्या उच्च अधिकारी इन 'कागजी शेरों' पर कोई ठोस कार्रवाई करें।
मुंडेर निर्माण का हिसाब: भोपाल से आए बजट से कितने कुओं की घेराबंदी की गई? क्या इसकी भौतिक जांच होगी? भ्रष्टाचार का बढ़ता कारवां पौधारोपण से लेकर वन्यजीव सुरक्षा तक, गोहपारू में हर जगह 'शासकीय राशि का बंदरबांट' आखिर कब रुकेगा।