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भारत की जनता आज भी अपराध को अपराध के नजरिए से देखना जानती है और वोट बैंक का तकाजा के रूप में वह अपना निर्णय देती है।

अब उपराष्ट्रपति भारत सरकार जगदीप धनखड़ ने महिला अत्याचार को निर्भया दिल्ली बलात्कार कांड से भी अधिक बर्बर बताया है।

इसके पहले भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपती मुर्मू ने भी कोलकाता के डॉक्टर महिला बलात्कार वह बहुत पीड़ा दायक बताया था दिल्ली में जंतर मंतर पर करीब 1 वर्ष धरना आंदोलन में बलात्कारियों के खिलाफ प्रकरण पंजीकृत करने और न्याय मांगने की विश्व स्तर के महिला खिलाड़ियों के मामले में ना तो राष्ट्रपति जी ने मुंह खोला था और ना ही उपराष्ट्रपति ने जो उनके नाक के नीचे घटना घट रही थी और पूरी दुनिया में भारत की नाक कट रही थी तब इन दो सर्वोच्च संवैधानिक पदाधिकारी का मुख बधिर रहना आश्चर्यजनक रहा।

यह अनुभव में देखा गया है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अपने नौसेना के संरक्षण में उनके परिसर में जिन महाराष्ट्र के आदर्श महापुरुष शिवाजी महाराज की ऊंची प्रतिमा का लोकार्पण किया था वह भ्रष्टाचार के गर्भ में पलते पलते 9 माह बाद ऐसे डिलीवर हो कर धड़ाम से टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गई जैसे यह भ्रष्टाचार की साक्षात प्रकट अवतार था जिसे बिखरना ही था वहां की भ्रष्ट तरीके से एकत्र हुई मिली जुली सरकार के लोग नेता जगह-जगह माफी मांगते दिख रहे हैं जबकि आरोप प्रत्यारोप भी करने का प्रयास किया यह हमारा अपराध नहीं है चुकी लोकार्पण प्रधानमंत्री जी ने किया था अतः प्रधानमंत्री जी भी पूर्ण आस्था से जिस प्रकार लोकार्पण किए थे उसी प्रकार सार्वजनिक माफी मांगी किंतु भारत में कंधार कट्टर हिंदुत्व की छवि प्रदर्शित करने वाली शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने उनके इस माफी में अहंकार की गंध की बात कह कर उसे खारिज कर दी प्रधानमंत्री ने कहा मैं माफी मांगता हूं किंतु क्या वीर सावरकर के अपमान के लिए किसी ने माफी मांगी शायद जब यह तय हो गया था कि भ्रष्टाचार के प्रति सार्वजनिक पारदर्शी प्रकरण में माफी नाम का नोट शीट तैयार किया जाए तो उसे राजनीतिक फुट के तौर पर किस प्रकार रखा जाए इस पर उनके आंतरिक विश्वविद्यालय में पीएचडी हो चुकी रही होगी।

जिसका पेपर माफी नाम के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक किया महाराष्ट्र में चुनाव भी होने हैं तब यह महाराष्ट्र के हाथ से फिसल जाने की असफल राजनीतिक माफी नाम के रूप में एक प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि अगर अयोध्या के राम देश की धार्मिक अंधभक्त हो चुकी जनता के लिए बड़ा वोट बैंक का धंधा था तो महाराष्ट्र में राम से भी बढ़कर शिवाजी महाराज धार्मिक आस्था के और राष्ट्रीयता के धरोहर थे जिनका सरकारी सैन्य संरक्षण में इतना दर्दनाक टीवी इसका जनक अपमान विशेष कर महाराष्ट्र की जनता के लिए असहनीय है यह कड़वी सच्चाई को राजनीति के भ्रम की धुंध में झूठ लाने के लिए अब कोलकाता का डॉक्टर बलात्कार कांड एक ट्रेडमार्क के रूप में राजनीतिक क्यों विकसित कर लिया है अन्यथा महिला के अत्याचारों की घटनाएं आम हो चुकी हैं और इन पर राजनीति का धंधा पारदर्शी तरीके से गंदे तरीके से चलता रहता है हैदराबाद की गौरवशाली वेटरनरी डॉक्टर के साथ वीभत्स तरीके से न सिर्फ बलात्कार हुआ बल्कि हत्या करके उसकी लाश को जला दिया गया पुलिस ने तथाकथित चार आरोपियों को पकड़ा भी और मैदान में ले जाकर के काउंटर नामक कानूनी हथियार से हत्या भी कर दी ताकि सबूत जड़ से नष्ट हो जाएं तब नेताओं ने प्रधानमंत्री उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति अगर सतर्क हो गए होते तो डॉक्टर प्रोटेक्शन एक्ट डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए सुनिश्चित तरीके से सुरक्षित घेरा खड़ा कर दिया जा सकता था। 

कोलकाता डॉक्टर हत्या और बलात्कार का मामला जन्म ही नहीं लेता लेकिन प्रदेश की लगभग साध्वी जीवन शैली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जो अपनी राजनीतिक स्वाभिमानी तरीके से अपनी राजनीति पर विश्वास करती हैं उन्हें राजनीतिक तरीके से जब हराया नहीं जा सका तब डॉक्टर बलात्कार हत्याकांड को सत्ता के संरक्षण में हउवा खड़ा किया जा रहा है। इसे एक तीर से कई निशाने लगाकर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को हुआ हुआ करके डराया भी जा रहा है जबकि सब जानते हैं महिला बलात्कार और हत्या के मामले में किस प्रकार से धर्म का नकाब मैं डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख गुरविंदर सिंह उर्फ राम रहीम दो प्रकरणों में 20-20 साल की सजा प्राप्त बलात्कार का आरोपी है इसके बावजूद भी पूरी बेशर्मी के साथ संविधान की दुहाई देकर भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में यह बार-बार जेल के बाहर आकर वोट राजनीति की दशा और दिशा तय करता है इस पर भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के बयान या कार्यवाहियां अथवा संदेश कभी नहीं देखे गए यदि राम रहीम इतना ही प्रिय है अथवा राजनीति के लिए लोकप्रिय है तो उसे भी राष्ट्रपति जी से कहकर सजा मुक्त करने का कानून क्यों नहीं लाया जा सकता यह भी एक प्रश्न चिन्ह है क्योंकि सब पारदर्शी है।

 भारत की जनता आज भी अपराध को अपराध के नजरिए से देखना जानती है और वोट बैंक का तकाजा के रूप में वह अपना निर्णय देती है राजनीतिक क्यों नहीं बस इसी संवैधानिक भय के कारण राम रहीम को सजा मुक्त करने का कानून नहीं बनाया है, ऐसा प्रतीत होता है क्योंकि महिला अत्याचार के मामले में न सिर्फ बलात्कार करना बल्कि बलात्कार को और महिला अत्याचार को सार्वजनिक करने के लिए जुलूस के रूप में महिला को निर्वस्त्र करके अगर वह भारत की सेवा की पत्नी है तो भी उसके साथ इसी प्रकार का सार्वजनिक अपमान करने पर भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का मुंह नहीं खुला था यह कैसा संविधान है आज भी मणिपुर चल रहा है एक बार भी प्रधानमंत्री वहां नहीं गए हैं उपराष्ट्रपति या राष्ट्रपति सेवा की सुरक्षा में अगर वहां जाते तो शायद लोकतंत्र का संविधान जिंदा होने की वहां संभावना अवश्य बनती किंतु शायद मणिपुर को गृह युद्ध की तरफ सत्ता के संरक्षण में डाल दिया गया है ऐसा क्यों नहीं कहा जाना चाहिए फिर किस मुंह से हमारे महामहीम ऊंची और पोती राजनीति के षड्यंत्र में फंसकर कोलकाता महिला बलात्कार कांड पर चिंता व्यक्त करते हैं यह आवश्यक सोचते रहना चाहिए जबकि सर्वोच्च संवैधानिक पद पर पद्शीन होने के बाद उनके निष्पक्ष होने और दिखाने की अपेक्षा हमेशा भारतीय संविधान में जिंदा बनी रहेगी आम जनता भी यही सोचती है यह दुर्भाग्य है कि भारतीय राजनीति अब इन पदों में भी सड़ांध करने लगी है हालांकि संवैधानिक प्रमुख सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले संज्ञान लेने पर ही डॉक्टरों की सुरक्षा के मामले में टीम गठित की है वही उसका निराकरण भी है ताकि भविष्य में ऐसी दुर्भाग्य जनक घटनाएं ना घट सकें लेकिन राजनीति दिनों दिन पतित होती जा रही है इसलिए राम रहीम अगर पैरोल में छूकर नंगा नाच करता रहता है तो 9 महीने में हमारी राष्ट्रीय पहचान शिवाजी महाराज की मूर्ति के गिर जाने पर भी एक भी राजनेता का इस्तीफा नहीं होता है बल्कि इसमें भी अवसर देखा जाता है और गौरव से कहा जाता है इससे भी बड़ी मूर्ति बनाई जाएगी लगे हाथ कोलकाता का डॉक्टर महिला अत्याचार का मुद्दा लगातार मीडिया और अपने कार्यकर्ताओं के द्वारा गर्म करने का सत्ता का प्रयास बेहद दुर्भाग्य जनक है यही प्रयास यदि मणिपुर में कर लिए गए होते और उसके जरिए कड़े संदेश भी जारी कर दिए गए होते तो महामहिम को चिंता नहीं करनी पड़ती और उपराष्ट्रपति को तुलना नहीं करनी पड़ती शायद हमें कुछ और देखना बाकी है यही भारत की नियत बनती जा रही है इसी को कहते हैं देश भगवान भरोसे चल रहा है और कोई बात नहीं

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