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संत शिरोमणि नामदेव आराध्य देव महाराज जी की जयंती धूमधाम से मनाई गई।

रिपब्लिक न्यूज।।

शहडोल // मुख्यालय जिला अंतर्गत नामदेव समाज के द्वारा प्रतिवर्ष के भांति इस वर्ष भी नामदेव समाज के आराध्य संत शिरोमणि श्री नामदेव महाराज जी की 753 वीं जयंती उत्सव नामदेव समाज के द्वारा नामदेव समाज परिसर जोधपुर जिला शहडोल ग्राम पंचायत के गांव में दिनांक 23 नवंबर 2023 को धूमधाम से मनाई गई।

कार्यक्रम की शुरुआत संत शिरोमणि नामदेव जी महाराज बिठूल भगवान एवं भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना के साथ साथ आरती भजन संध्या में संपन्न हुआ।

तत्पश्चात समाज की एकता शिक्षा एवं विकास पेड़ लगाओ बेटी बचाओ पर चर्चा की गई।

जिसमें जिले में समाज के सैकड़ो लोग एवं ग्राम के अन्य समाज के लोग भी उपस्थित थे अंत में प्रसाद वितरण कर भंडारे का आयोजन भी किया गया संत नामदेव जयंती उत्सव कार्यक्रम आज पूरे देश भर में मनाई गई।

आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी (13) के दिन महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव की पुण्यतिथि मनाई जा रही है। नामदेव भारत के महाराष्ट्र में जन्मे संत-कवि है।

 संत नामदेव जी का जन्म भक्त कबीर जी से 130 वर्ष पूर्व 1270 में महाराष्ट्र के जिला सातारा के नरसी बामनी गांव में कार्तिक शुक्ल एकादशी को हुआ था। उनके पिता का नाम दामाशेटी और माता का नाम गोणाई देवी था। उनका परिवार भगवान विठ्ठल का परम भक्त था। 

 संत नामदेव के गुरु विसोबा खेचर थे। गुरुग्रंथ और कबीर के भजनों में इनके नाम का उल्लेख मिलता है। ये महाराष्ट्र के पहुंचे हुए संत हैं। उन्होंने ब्रह्मविद्या को लोक सुलभ बनाकर उसका महाराष्ट्र में प्रचार किया तो संत नामदेव जी ने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक उत्तर भारत में 'हरिनाम' की वर्षा की।

 एक दिन उनके पिता बाहर गांव की यात्रा पर गए थे, तब उनकी माता ने नामदेव को दूध दिया और कहा कि वे इसे भगवान विठोबा को भोग में चढा दें। तब नामदेव सीधे मंदिर में गए और मूर्ति के आगे दूध रखकर कहा, ‘लो इसे पी लो।’ उस मंदिर में उपस्थित लोगों ने उनसे कहा- यह मूर्ति है, दूध कैसे पिएगी?

परंतु पांच वर्ष के बालक नामदेव नहीं जानते थे कि विठ्ठल की मूर्ति दूध नहीं पीती, मूर्ति को तो बस भावनात्मक भोग लगवाया जाता है। तब उनकी बाल लीला समझ कर मंदिर में उपस्थित सब अपने-अपने घर चले गए। जब मंदिर में कोई नहीं था तब नामदेव निरंतर रोए जा रहे थे और कह रहे थे, ‘विठोबा यह दूध पी लो नहीं तो मैं यहीं, इसी मंदिर में रो रोकर प्राण दे दूंगा तब बालक का भोला भाव देखकर विठोबा पिघल गए। तब वे जीवित व्यक्ति के रूप में प्रकट हुए और स्वयं दूध पीकर नामदेव को भी पिलाया। तब से बालक नामदेव को विठ्ठल नाम की धुन लग गई और वे दिन रात विठ्ठल नाम की रट लगाए रहते थे।  

 उनके गुरु महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत ज्ञानेश्वर थे। उन्होंने बह्मविद्या को लोक सुलभ बनाकर उसका महाराष्ट्र में प्रचार किया तो संत नामदेव जी ने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक उत्तर भारत में 'हरिनाम' की वर्षा की।

भक्त नामदेव जी का महाराष्ट्र में वही स्थान है, जो भक्त कबीर जी अथवा सूरदास का उत्तरी भारत में है। उनका सारा जीवन मधुर भक्ति-भाव से ओतप्रोत था। विट्ठल-भक्ति भक्त नामदेव जी को विरासत में मिली। 

 उनका संपूर्ण जीवन मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा। मूर्ति पूजा, कर्मकांड, जातपात के विषय में उनके स्पष्ट विचारों के कारण हिन्दी के विद्वानों ने उन्हें कबीर जी का आध्यात्मिक अग्रज माना है। संत नामदेव जी ने पंजाबी में पद्य रचना भी की। भक्त नामदेव जी की बाणी में सरलता है। वह ह्रदय को बांधे रखती है। उनके प्रभु भक्ति भरे भावों एवं विचारों का प्रभाव पंजाब के लोगों पर आज भी है।

कार्यक्रम में नामदेव समाज के साथ-साथ ग्राम वासी के अन्य समाज के लोग भी उपस्थित रहे और जिले के सभी क्षेत्र से नामदेव समाज के व्यक्तियों का आगमन रहा कार्यक्रम का आयोजन कर भव्य रूप देकर संत शिरोमणि नामदेव जी महाराज कि जयंती मनाई गई।

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