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गणतंत्र दिवस समारोह संपन्न जिला पत्रकार संघ शहडोल

 मन की बात



बचावत आयोग संघर्षरत पत्रकार को सलाम


झंडारोहण के लिए

पहुंची टीम 


शहडोल सब्जी मंडी स्थित एक भवन में जिला पत्रकार संघ नामक संस्था के नवोदित सदस्यों ने 26 जनवरी यानी गणतंत्र का झंडारोहण किया। भारतीय क्रिकेट टीम की तरह मैदान में खेलने वाले 11 खिलाड़ियों की तरह बाद में एक फोटो भी आई। मन रोमांचित हो गया, एक एक्स्ट्रा सदस्य भी नहीं दिखा। जबकि कथित घोषित कार्यकारिणी में जैसा छपाया और दिखाया गया उस हिसाब से वर्षों की दबी कुचली भावना से निजात पाने के लिए ही सही तथाकथित घोषित/निर्वाचित/मनोनीत चाहे जो कह ले कार्यकारिणी के लोगों को भारत के झंडे का जिला पत्रकार संघ के नाम पर उस भवन पर झंडारोहण करना चाहिए था । किंतु इस पुनीत कार्य को वह भी अछूत कर गए जो रिमोट कंट्रोल के जरिए इस भवन में लगने वाले जिला पत्रकार संघ नामक संस्था पर कब्जा करना चाहते हैं ।समय-समय की बात है अन्यथा अपनी पवित्रमंसा को लेकर जब वे साथ चले थे, कम से कम झंडारोहण में एक झंडे के नीचे दिखते थे। अब अपना झंडा अलग हो गया ,डंडा चल रहा है। डंडा डाले जा रहे हैं, डंडा निकाले जा रहे हैं। नतीजतन तीन अंतरराष्ट्रीय परिवेश से आए सदस्य 4 राष्ट्रीय परिवेश से आए सदस्य और अन्य चार एक्सीडेंटल उपस्थित हुए सदस्य भवन के सामने एकाकार दिखे। जिसे जिला पत्रकार संघ कहने का प्रयास हुआ। तो बाकी रिमोट कंट्रोल से पत्रकारिता को चलाने वाले तमाम सदस्य इस झंडे के नीचे क्यों नहीं दिखे..? झंडारोहण गौरव की बात है इसमें शर्म क्या है...? तो बाकी लोग कहां गए..? यह बड़ी बात है क्या पत्रकारिता का जमीर उनका जाग गया..? या फिर सो गया...? अथवा देर रात की खुमारी के बाद नींद से नहीं  जाग पाया...?


 इसमें बहस की गुंजाइश नहीं रह जाती क्योंकि रिमोट कंट्रोल में स्विच ऑन और आफ है। चैनल बदलने का स्विच ही इंस्टॉल नहीं किया गया ऐसा लगता है । कुर्ता पजामा पहनने वाले हमारे एक वरिष्ठ साथी पत्रकार क्रिकेट टीम के बेहतरीन प्लेयर हो सकते थे। फिर भी अछूत है। यह उससे भी बड़ा प्रश्न है।


 शहडोल में पत्रकारिता के बचावत वेतन आयोग की ज्योति जलाने वाला कोई अगर एकमात्र पत्रकार है वह नीव की ईट की तरह इस युद्ध को अकेले लड़ रहा है उसे ना झंडे की जरूरत है ना डंडे  की है। चुपचाप अपना काम कर रहा है। अगर शहडोल मैं पत्रकारिता मे न्याय के नाम पर कोई एक एकमात्र झंडारोहण का अधिकारी था और होगा तो  वह अज्ञात पत्रकार होगा ऐसा मैं समझता हूं और उसे सैलूट भी करता हूं। झंडारोहण की दास्तान से मुझे उस पत्रकार और उसकी पत्रकारिता का संसदीय सम्मान करने का अवसर भी मिला।


बहरहाल इतनी हमदर्दी तो बनती हैं उन सबके लिए जो रिमोट कंट्रोल के जरिए किसी भवन में पत्रकारिता को संघ के नाम पर जिंदा पत्रकार संघ बनाने में लगे हैं। किंतु युग बदल गया है दिल्ली में बैठे-बैठे कश्मीर में भी शिलान्यास हो जाता है घर में बैठकर रिमोट कंट्रोल के जरिए भी झंडारोहण किया जा सकता है ...वही कर लेते भैया और वर्चुअल मीटिंग करके अपने अपने घर से झंडे को सलूट करते थे ...जैसे हम अपने एकमात्र जमीनी संघर्षरत पत्रकार को इस अवसर पर सलूट कर रहे हैं ...वैसे तो मैं खुलासा कर देता यह एकमात्र पत्रकार कौन है... यह शहडोल में वास्तव में कानून में संघर्षरत जिंदा है। पत्रकारिता के संघर्ष के लिए संघर्षरत भी है लेकिन कुछ साल पहले मैंने भी प्रयास किया था कि कुछ पत्रकार जिंदा हो जाए किंतु वह सिर्फ एक दुर्घटना थी... बहरहाल बीटिंग स्ट्रीट के तर्ज पर इस आलेख को "पत्रकार संघ का बीटिंग स्ट्रीट भाग ख "के रूप में देखा जाना चाहिए। ज्यादा कुछ नहीं और उम्मीद करना चाहिए कि वह सब गणतंत्र के नाम पर ही पत्रकार संघ की गणतंत्र को ठीक करने के लिए उसे संशोधित करने के लिए और नई पीढ़ी को मार्गदर्शी बनाने के लिए बैठक करनी चाहिए। ताकि तमाम धूर्ततापूर्ण त्रुटियों का संशोधन हो सके। ताकि अन्य गैर सरकारी संगठन भी इससे ठीक हो सकें।


 क्योंकि आप आदिवासी क्षेत्र के "चौथे स्तंभ" हैं और हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी का "पांचवा स्तंभ" भी चौथे स्तंभ में विलय होने को बेकरार है। आशा करनी चाहिए स्वतंत्रता दिवस पर ना इस भवन के ऊपर, ना इस भवन के बाहर बल्कि इस भवन के अंदर सामुदायिकता कि भावना के साथ सर्वधर्म समभाव को लेकर जिला पत्रकार संघ अपना सम्मान बचाएगा अन्यथा पतन भी एक गौरवशाली पारदर्शी प्रक्रिया है ।जिसे अनुभव में पाया गया है कि पूरे गर्व के साथ रिमोट कंट्रोल इसे जीने का प्रयास किया है। जो वास्तव में दुखद है।


 आखिर कब तक बालू से सर गुस्सा कर शुतुरमुर्ग तूफान के थमने का इंतजार करेगा।

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