छात्रा को धमकी देकर रहवासी स्थल पर की मारपीट।
रिपब्लिक न्यूज।।
शहडोल मुख्यालय जिला मुख्यालय नगर क्षेत्र में एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति और एक बालिक हो चुकी ब्राह्मण लड़की (कहते हैं कॉलेज की छात्रा है) उस बालिका को रहवासी स्थल में इस कदर पीटता है कि लगभग बेहोश हो जाती है मामला पुलिस तक जाता है चुकी अज्ञात कर्म के कारण लड़की रिपोर्ट नहीं करती इसलिए कहा जाता है कि उसे कथित महिला अत्याचारी को 151 धारा के तहत पुलिस बंद कर देती है और फिर जैसा होता है वह आराम से छूटकर इस शहर से गायब हो जाता है।
यही मामला अगर दलित छात्रा के साथ होता तो शहडोल की चींटी-मटा प्रकार के नेता से लेकर हो सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ट्वीट करके अफसोस जाता रहे होते… क्योंकि मामला बोट के धंधे का है… क्या ऐसे में भी विदेश में राहुल गांधी पिछले दिनों भारत में आरक्षण कब तक चलेगा?, इस सवाल के जवाब में कहा था, कांग्रेस तभी आरक्षण खत्म करने के बारे में सोचेगी जब देश में सभी को समान अवसर मिलने लगेंगे। फिलहाल भारत में ऐसी स्थिति नहीं है। और उसे उल्टा-सीधा करके यहां वोट बैंक की यज्ञशाला खोल दी गई.. भाजपा के द्वारा और उनके सहयोगियों के द्वारा।
क्या अब जब कथित तौर पर एक अनुसूचित जाति का व्यक्ति शहडोल के वीआईपी केंद्र बने गांधी स्टेडियम के पब्लिक प्लेस में खुलेआम एक ब्राह्मण छात्रा पर अत्याचार करता है तो भी मान कर चला जाए कि उसे आरक्षण की जरूरत है…? या युग परिवर्तन हो चुका है…?
बहरहाल यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्या है। हम शहडोल के लोग छोटी सी बस्ती में रहते हैं किंतु यहां पर जिस प्रकार का बर्ताव स्टेडियम में पिछले तीन दिनों के अंदर हुआ रहवासी स्थान में सूत्रों ने एक तथाकथित कोचिंग करने वाला अज्ञात व्यक्ति जो अनुसूचित जाति का है किंतु स्वयं को अजय सिंह बघेल बताता था क्योंकि उसे मालूम था रीवा क्षेत्र में बघेल दबंग होने का प्रतीक है। बाद में पता चला वह अजय बंशकार है जो नगर पालिका के रैन बसेरा में नगर पालिका का मेहमान था।
अभी यह मेहमान कथित तौर पर गायब है जो शहडोल जिले का नहीं है तो यह कौन था.. कहां से आया और शहडोल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जगह गांधी स्टेडियम में उसका दबंग स्वरूप छात्र और छात्रों के बीच में कैसे स्थापित हुआ..?, किसने कराया..? यह भी बड़ा प्रश्न चिन्ह है।
उससे बड़ा प्रश्न चिन्ह यह है की शहडोल संसदीय क्षेत्र की सांसद एक महिला हिमाद्री सिंह है एक पायदान और नीचे उतरे तो मौका स्थल क्षेत्र की विधायक एक महिला है मनीषा सिंह, देश में महिला अत्याचार को लेकर के आए दिन प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति चिंता व्यक्त करते ही रहते हैं। महिलाओं पर अत्याचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फिर क्या कारण है की गांधी स्टेडियम शहडोल में एक छात्रा के साथ सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हुए एक अनुसूचित जाति का अज्ञात व्यक्ति मारपीट करता है। और उस लड़के का हिम्मत इतना तगड़ा है कि वह अपने अधीन तमाम छात्र-छात्राओं को इस प्रकार के दबा के रखा कि उन लोगों ने रिपोर्ट करने में भी अपनी खैर नहीं समझी…? और हमारी पुलिस इतनी विकलांग है कि वह इन छात्र-छात्राओं से काउंसलिंग करके यह जानने का प्रयास नहीं की आखिर इतनी बड़ी प्रताड़ना के बाद कि वह लड़की लगभग बेहोश हो गई थी… अगर उसने रिपोर्ट नहीं लिखी या अन्य छात्र-छात्राओं ने उसे रिपोर्ट नहीं लिखने दिया तो उसके पीछे कौन से मनोवैज्ञानिक कारण थे…?। क्या कोई ब्लू-फिल्म का कारोबार सफलता के साथ शहडोल में चलाया जा रहा है..? या फिर छात्र-छात्राओं के ब्लैकमेलिंग करके ऐसा क्यों दबा के रखा गया है।
वह अत्याचार के खिलाफ एक शब्द नहीं बोल स्वयं को नपुंसक साबित करते रहे.. क्या यही नई पीढ़ी का पुरुषार्थ है कि वह ब्लैकमेल हो रही है या फिर कौन सी अज्ञात बात है..?
इसके बावजूद की एक दिन पहले ही शहडोल की पुलिस मार्च पास्ट करते हुए यह प्रदर्शित करने का काम किया है कि हर नागरिक सुरक्षित है और जब गांधी स्टेडियम में युवा छात्रा ही इतनी असुरक्षित है कि उसे सार्वजनिक रूप से प्रताड़ित किए जाने पर भी वह फिर नहीं कर पाई…? तो काहे की पुलिस, और कौन सी सुरक्षा..?
अब शहडोल में कोई महिला आयोग तो जिंदा है ही नहीं.. मध्य प्रदेश का महिला आयोग लगभग मृत प्राय है राजनीतिक बुद्धि-विलासिता का पर्याय बन चुका है.. राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष जिन्होंने दिल्ली की एक सांसद को सुरक्षा की गारंटी दी तब उसने अपराधी विभव कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज की…, तो ऐसे में शहडोल में इस घटना की शिकायत को संज्ञान लेने में क्या राष्ट्रीय महिला आयोग सुरक्षा देने की हैसियत में है अथवा नहीं कि वह महिला अपनी शिकायत दर्ज कर सके कि बिना लाग-लपेट के उसके साथ न्याय होगा।
अन्यथा अपना इस घटिया राजनीतिक हो रहे लोकतंत्र में स्वयं को बदनाम छात्रा क्यों करेगी..? यह बड़ा प्रश्न है।
इसलिए शहडोल क्षेत्र को लोगों को जानना चाहिए अपने लड़कियों को शहडोल मुख्यालय में भेजने के पहले अशास्त हो जाना चाहिए की अध-कचरा शहडोल में अत्याचार अब महानगर के स्तर का हो चला है तो जरा बचकर के और संभाल करके सिर्फ अपने भरोसे अपने बच्चों को शिक्षा के लिए भेजें… क्योंकि पुलिस के पास कोई कानून नहीं है अगर वह अत्याचार का मामला आरक्षण वर्ग के रहने वाले लोग करते हैं तो उन्हें इस बात का आरक्षण भी है कि उन्हें इसकी छूट मिलेगी… शायद इसीलिए बदनामी के डर से सत्यता को दबा दिया गया है।किंतु अगर यह आम बात है तो जवाब देही कलेक्टर, कमिश्नर और पुलिस अधीक्षक तथा एडीजीपी की क्यों नहीं है…? कि वे स्वत संज्ञान लेकर इस घटना के बहाने नगर मुख्यालय में रहने वाली तमाम लड़कियों को आस्वस्त करें ऐसी पुनरावृत्ति नहीं होगी। इसका रास्ता सुनिश्चित करें की कम से कम सार्वजनिक स्थलों पर भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं ना हो सके और जो घटना घट गई है उसकी सच्चाई बिना प्रभावित छात्रा का पहचान,नाम उजागर किए सार्वजनिक करना चाहिए कि लोकतंत्र शहडोल में अभी भी जिंदा है…?
अगर ऐसी घटना गांधी स्टेडियम में नहीं घटी है तो इस भ्रम को क्यों बनाया जा रहा है।