Top News

शहर के मध्य स्थित इस मंदिर ट्रस्ट का एक बड़ा तालाब अतिक्रमणकारियों ने पक्षकारों की मिली भगत से कब्जाकर के लूट लिया और प्रशासन ने ट्रस्ट के कब्जे की तालाब

आखिर इतना कॉन्फिडेंस आता कहां से है…?                    (त्रिलोकी नाथ) 

करीब 12 साल पहले मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने शहडोल के मोहन मंदिर ट्रस्ट के मामले में एक आदेश पारित किया कि जब तक विवाद में निर्णय नहीं आ जाता है तब तक मंदिर-ट्रस्ट का प्रबंधन सोहागपुर के एसडीएम द्वारा गठित की गई स्वतंत्र समिति मंदिर का संपूर्ण प्रबंधन देखेगी। यानी पक्षकार श्रवण कुमार एवं अन्य तथ

पक्षकार रोहिणी प्रपन्नाचार्य लवकुश बगैरा अपना संपूर्ण प्रभार स्वतंत्र कमेटी को सौंप देंगे। जो मंदिर ट्रस्ट का प्रबंधन न्यायालय के निर्णय आने तक करेगी।

 किन्तु 12 साल में शहडोल कमिश्नर, कलेक्टर और एसडीएम का पुरुषार्थ इतना कमजोर रहा कि वह मंदिर ट्रस्ट को क्षति पहुंचाने वाले पक्षकार लवकुश वगैरह से हाई कोर्ट की निर्देश से गठित स्वतंत्र समिति को प्रभार नहीं दिला पाए। और 12 साल मे बावजूद इसके कमिश्नर और कलेक्टर द्वारा हर साल तालाब के संरक्षण का जोरशोर से प्रचार होता रहा शहडोल शहर के मध्य स्थित इस मंदिर ट्रस्ट का एक बड़ा तालाब अतिक्रमणकारियों ने पक्षकारों की मिली भगत से कब्जाकर के लूट लिया और प्रशासन ने ट्रस्ट के कब्जे की तालाब तथा उसकी मेड़, कैचमेंट जमीन पर धारणा अधिकार का पट्टा देने का भी काम किया। कुछ भूत( मर चुके) बन चुके ट्रस्ट के किरायदार,

 लवकुश की सहायता से अवैध डबल स्टोरी मकान भी बना डाला.. तो स्वयं कर्वी बांदा से आकर लवकुश पांडे मंदिर ट्रस्ट का प्रभार देने की बजाय अपने प्रभार में रखे ट्रस्ट की कागजों के आधार पर इसी मंदिर ट्रस्ट की तेतीस डिसमिल, करोड़ों रूपये की जमीन पर अवैध निर्माण कर कब्जा कर लिया। तो प्रश्न उठता ही है कि इतना का

ंफिडेंस कर्वी, बांदा से शहडोल आकर अवैध काम करने वाले लवकुश वगैरा मे आता कहां से है….? ऐसा नहीं है इसके सहयोगी साथी मूर्ख है..? वे अपने-अपने क्षेत्र के तथाकथित विद्वान है। उसमें एक वरिष्ठ पत्रकार है एक वरिष्ठ डॉक्टर है और कुछ तथाकथित समाज सेवी भी हैं इन्हे चाहकर भी अनपढ़ या मूर्ख नहीं कहा जा सकता कि 

वे सब हाई कोर्ट के आदेश को पढ़ लिख नहीं सकते…? और इन सब से हटकर प्रशासन में बैठा हुआ बौद्धिक प्रमाणित अधिकारी वर्ग भी है जिनका पुरुषार्थ हाईकोर्ट के आदेश को पालन करने में गत 12 साल में अब तक तो अक्षम साबित हुआ। जिसमें एसडीएम, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) वर्ग के भी रहे…?जिसकी वजह से इस मंदिर ट्रस्ट

 की ना सिर्फ संपत्ति खुर्द-बुर्द हो रही है बल्कि खुला डाका भी डाला जा रहा है।जो अपराधियों के बड़े हुए कॉन्फिडेंस से प्रमाणित होता है। तो सवाल उठेगा ही आखिर अपराधी का कॉन्फिडेंस आता कहां से है….?


शिवराज सिंह मध्य प्रदेश के बीते हुये भाजपा नेता है जिन्होंने अपने तिकड़म से प्रदेश को लाखों-करोड़ों रुपए कर्ज में गिरबी रख कर के चुनाव जीतने के लिए अन्ततः लाडली बहना योजना का प्रोपेगेंडा खड़ा किया ताकि यह प्रमाणित कर सकें कि भाजपा उनकी वजह से प्रदेश विधानसभा चुनाव जीती.. और ऐसा माहौल भी बन गया था‌ क

िंतु माहौल से भी ज्यादा भयानक जीतने के बाद उन्हें “दूध में पड़ी मक्खी की तरह”उनके हाईकमान याने मोदी-साह ने मध्य प्रदेश की राजनीति से निकाल फेंका।जो स्वयं में एक प्रमाण पत्र था भाजपा ने विधानसभा का चुनाव सिर्फ शिवराज के कारण नहीं जीता..।

 बड़ी मुश्किल से संसद पहुंचने का रास्ता खुला है देखना होगा जिस मुखरता से शिवराज प्रदेश में राजनीतिक करते थे संसद में वह कर पाते हैं या फिर वे उनके सामने “भीगी बिल्ली की तरह” खड़े रहते हैं…? तो फिर प्रश्न उठेगा ही आंखिर मोदी-साह का कॉन्फिडेंस आता कहां से है…?

इसे थोड़ा और विस्तृत करते हैं, बिहार की राजनीति में जो कॉन्फिडेंस 35 साल के युवा नेता पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की तेज में दिखता है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही चुनौती देता है कि यह बिहार है उन्हें जेल भेजने की बात तो दूर, हाथ लगाकर भी तो देखें जनता जवाब देगी। क्योंकि प्रधानमंत्री मो

दी ने अप्रत्यक्ष रूप से ही सही किसी को चुनाव बाद जेल में डालने की बात कही थी। यह जमीनी हकीकत से उभरा कॉन्फिडेंस है क्योंकि जो रोजगार लोगों की नौकरी के मामले में जो वादा किया था उसे कर दिखाने के बाद जो भीड़ मतदाताओं की बिहार में बाढ़ की तरह तेजस्वी के पक्ष में उभरी वह लोकसभा चुनाव में अगर संसद में सा

ंसद के रूप में दिल्ली नही पहुंच पाती है तो कहना ही होगा कि भाजपा के मोदी-साह का “400 पार” का कॉन्फिडेंस आखिर आता कहां से है…?

फिर चाहे हरियाणा हो मणिपुर अथवा कर्नाटक यहां भाजपा की जीत बतायेगी।

ऐसी कॉन्फिडेंस यानी आत्मविश्वास किसी का किसी धरातल पर ही खड़े होते हैं कि 1 जून को जब विपक्षी नेता एक साथ खड़े होकर 28 पार्टियां दिल्ली में पत्रकार वार्ता अपनी बात रखते हैं और प्रधानमंत्री मोदी जैसे पिछली बार भगवान केदारनाथ के पास जाकर साधु के भेष मे दिखे इस बार भी चुनाव के अंतिम चरण में केरल की क

न्याकुमारी उसी तरह साधु के भेष में एकांत वास करते दिखे तो सवाल उठता ही है कि 400 पार का मोदी-शाह का कॉन्फिडेंस आखिर आता कहां से है…?

चीना जीतना&हारना समान्य लोकतंत्र की खूबसूरती है ।लोकतंत्र में हर स्तंभ स्वतंत्र और संविधान के प्रति शपथ पूर्वक हजारों साल की गुलामी के बाद जिंदा है इसमें प्रतीकात्मक अशोक चिन्ह की चार शेरों की तरह हैं जो लोकतंत्र की चौकीदारी करते हैं जिसमें दिखने वाले तीन शेर न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका हैं।औ

र पत्रकारिता अदृश्य शेर की तरह जिम्मेदार वर्ग है और चारों शेरों को यदि भीगी बिल्ली बना दिया जाए तो प्रश्न उठता ही है कि आखिर उनका 400 पार का कांफिडेंस आता कहां से है..? क्योंकि जे कॉन्फिडेंस किसी बड़ी दुर्घटना में जब कोई इंदिरा गांधी की हत्या होती है कब उनके उत्तराधिकारी कॉन्ग्रेस पार्टी के राजीव गा

ंधी को जरूर मिल सकती है क्योंकि भारत की भावनात्मक मानवीय जनता का बहाव हो सकता है लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ नहीं दिखा बल्कि इसकी विपरीत अलग-अलग कारणों से मंहगाई, बेरोजगारी किसानों के साथ अत्याचार कुप्रबंधन महिला अत्याचार बलात्कार आदि आदि कारणों का भी बाहुल्यता होती देखी गई। बावजूद इसके अगर 400 बार

 कांफिडेंस लगातार मोदी साह ने दोहराया है सवाल स्वाभाविक खड़ा होता है कि आखिर कितने कॉन्फिडेंस आता कहा

 से है…?



Previous Post Next Post